📌 1. आंदोलन क्यों शुरू हुआ?
बीकानेर और पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में खेजड़ी (Prosopis cineraria) के पेड़ों की कटाई को लेकर तीव्र विरोध हो रहा है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि सोलर पार्क, इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए हजारों खेजड़ी पेड़ बिना पर्याप्त संरक्षण के काटे जा रहे हैं, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी और समुदायों को भारी प्रभाव हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण-संरक्षण समूह, संत, सामाजिक कार्यकर्ता और आमजन एकजुट होकर आंदोलन कर रहे हैं।
खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष भी है और रेगिस्तान की पारंपरिक जीवनशैली में इसका बहुत महत्व है — मृदा संरक्षण, जल संरक्षण, पशुपालन-खाद्य स्रोत और सांस्कृतिक पहचान की वजह से।
📌 2. आंदोलन की प्रमुख मांगें
✅ राज्य में खेजड़ी व अन्य पेड़ों की कटाई रोकना
✅ Tree Protection Act/कड़ाई से लागू होने वाला कानून
✅ बिना पर्यावरणीय मंजूरी और प्रभाव अध्ययन के पेड़ों की कटाई पर कठोर रोक
आंदोलनकारी सिर्फ प्रशासन के लिखित आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं — वे चाहते हैं कि अस्थायी नियमों के बजाय स्थायी और कठोर कानूनी संरक्षा बने।
📌 3. आंदोलन का स्वरूप — महापड़ाव और आमरण अनशन
📍 बीकानेर में यह आंदोलन महापड़ाव (सिट-इन) के रूप में चल रहा है, जिसमें लोग सुबह-शाम भजनों से विरोध जता रहे हैं और कई अनशन पर बैठे हुए हैं। कुछ समर्थक क्रमिक अनशन (हंगरी स्ट्राइक) पर भी हैं। सरकार ने पहले ही कटाई पर रोक का आश्वासन दिया है, लेकिन आंदोलन जारी है।
📍 आंदोलन के चौथे दिन कुछ संतों की तबीयत बिगड़ने की ख़बर भी आई, क्योंकि वे लंबे समय तक अमरण अनशन पर बैठे थे।
📌 4. राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
🔹 केंद्रीय मंत्री ने कुछ लोगों पर राजनैतिक आग उगलने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार समाधान ढूंढ रही है।
🔹 राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने सरकार को चेतावनी दी कि वे भी आंदोलन का नेतृत्व करने आ सकते हैं अगर सरकार सकारात्मक कदम नहीं उठाती।
🔹 बाड़मेर जिला बार एसोसिएशन ने आंदोलन को समर्थन दिया और प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।
🔹 बीकानेर का व्यापक बंद (bandh) भी हुआ — व्यापारिक संगठनों ने कटाई के विरोध में बाजार दोपहर तक बंद रखे।
📌 5. सरकार का रुख और आश्वासन
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि सरकार खेजड़ी पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी और इसके लिए कठिन उपाय करेगी। उन्होंने कहा कि एक विशिष्ट Tree Protection Act लाने पर विचार किया जा रहा है ताकि कटाई के खिलाफ कानूनी सुरक्षा मजबूत हो। आंदोलनकारी समूह से कह रहे हैं कि वे कानून बनने तक आंदोलन नहीं छोड़ेंगे।
📌 6. आंदोलन का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ
खेजड़ी के संरक्षण का संघर्ष आज की लड़ाई अकेली नहीं है — इसका ऐतिहासिक संस्करण 1730 के खेजरली बलिदान/काटता विरोध से जुड़ा है।
उस समय महाराजा के आदेश पर खेजड़ी पेड़ों की कटाई रोकने के लिए 363 बिश्नोई समुदाय के लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी (जिसमें अमृता देवी और उनके परिवार शामिल थे)। इस घटना को आज भारत का पहला पर्यावरण-संरक्षण आंदोलन माना जाता है और कहा जाता है कि यह बाद में चिपको आंदोलन को प्रेरित करने वाला पहला कदम था।
📌 7. आंदोलन का प्रभाव
🌿 आंदोलन ने बीकानेर और आसपास के इलाकों में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर व्यापक चेतना पैदा की है, जिसकी चर्चा राजस्थान विधानसभा और राजनीतिक दलों तक में हो रही है।
🌿 यह आंदोलन पर्यावरण संरक्षण, पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच विकास बनाम संरक्षण के मुद्दे को सामने ला रहा है।
🎥 लाइव आंदोलन वीडियो (YouTube)
📌 निष्कर्ष
खेजड़ी बचाओ आंदोलन एक सामाजिक-पर्यावरणीय आंदोलन बन गया है जहाँ स्थानीय समुदाय, संत, युवा, व्यापार संगठन और राजनीति के कई धड़े एक साथ खड़े होकर खेजड़ी के संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह संघर्ष सिर्फ पेड़ों की सुरक्षा नहीं, बल्कि राजस्थान के पारंपरिक पारिस्थितिकी और जीवन-शैली की रक्षा से जुड़ा हुआ है।