बाड़मेर | 5Broview
राजस्थान के जिले में तेल उत्पादन क्षेत्र से जुड़ी एक गंभीर पर्यावरणीय घटना सामने आई है। के ऐश्वर्या वेलपैड-8 क्षेत्र से जुड़े तेल उत्पादन सिस्टम में तकनीकी खराबी के कारण स्थानीय किसान हरजीराम खोथ के खेत में कच्चे तेल का लगातार पांच दिनों तक रिसाव होता रहा। इस घटना से क्षेत्र के किसानों में चिंता और आक्रोश का माहौल बन गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार खेत में अचानक काली परत, तेलीय पदार्थ और तेज गंध दिखाई देने पर ग्रामीणों को रिसाव की जानकारी मिली। इसके बाद किसानों ने कंपनी अधिकारियों एवं प्रशासन को सूचना दी। जांच में सामने आया कि तेल उत्पादन से संबंधित पाइपलाइन या दबाव प्रणाली में आई खराबी के चलते कच्चा तेल जमीन की सतह पर फैलता रहा, जिससे कृषि भूमि प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कंपनी ने तुरंत कार्रवाई करते हुए ऐश्वर्या वेलपैड-8 से जुड़े 20 से अधिक तेल कुओं का संचालन अस्थायी रूप से बंद कर दिया। तकनीकी विशेषज्ञों की टीम मौके पर पहुंचकर रिसाव के स्रोत की पहचान, पाइपलाइन निरीक्षण और सुरक्षा मानकों की जांच में जुट गई है। कंपनी द्वारा प्रभावित क्षेत्र में सफाई कार्य तथा मिट्टी परीक्षण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
इधर स्थानीय किसानों ने फसल नुकसान, भूमि की उर्वरता में कमी और भूजल प्रदूषण की आशंका जताते हुए उचित मुआवजे की मांग उठाई है। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण कर पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने और विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
राजस्थान विधानसभा में बायतु विधानसभा के विधायक हरीश चौधरी ने विधानसभा में उठाया यह मुद्दा जिससे आम लोगों की आवाज सरकार तक पहुंची और शीघ्र ही इस समस्या का निदान करने के लिए अपील की है।
राजस्थान के जिले में संचालित की तेल उत्पादन परियोजना से जुड़े ऐश्वर्या वेलपैड-8 क्षेत्र में हाल ही में कच्चे तेल के रिसाव की गंभीर घटना सामने आई है। जानकारी के अनुसार यह रिसाव स्थानीय किसान हरजीराम खोथ के कृषि क्षेत्र में लगातार लगभग पांच दिनों तक होता रहा, जिससे आसपास की जमीन, मिट्टी और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। खेत में अचानक तेल जैसी काली परत दिखाई देने और तेज गंध फैलने के बाद ग्रामीणों ने इसकी सूचना प्रशासन और कंपनी अधिकारियों को दी। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि तेल उत्पादन से जुड़े पाइपलाइन या भूमिगत दबाव प्रणाली में तकनीकी खराबी के कारण यह रिसाव हुआ, जिसके चलते कच्चा तेल धीरे-धीरे खेत की सतह पर फैलता रहा।
घटना की गंभीरता को देखते हुए कंपनी प्रशासन ने तुरंत एहतियाती कदम उठाते हुए ऐश्वर्या वेलपैड-8 से जुड़े 20 से अधिक तेल कुओं का संचालन अस्थायी रूप से बंद कर दिया और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम को मौके पर भेजा गया। कंपनी द्वारा रिसाव के स्रोत की पहचान, पाइपलाइन निरीक्षण, दबाव परीक्षण और सुरक्षा मानकों की पुनः जांच की प्रक्रिया शुरू की गई है। वहीं स्थानीय किसानों और ग्रामीणों ने भूमि की उर्वरता, फसल नुकसान तथा भूजल प्रदूषण को लेकर चिंता व्यक्त की है और उचित मुआवजे की मांग भी उठाई है। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण कर स्थिति का आकलन किया तथा पर्यावरणीय प्रभाव की रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल का लंबे समय तक खुला रिसाव कृषि भूमि की उत्पादक क्षमता को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और फसलों की वृद्धि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इस घटना ने एक बार फिर तेल उत्पादन क्षेत्रों में सुरक्षा प्रबंधन, पाइपलाइन मॉनिटरिंग और पर्यावरण संरक्षण उपायों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल कंपनी द्वारा रिसाव को नियंत्रित करने, प्रभावित क्षेत्र की सफाई और नुकसान के आकलन की कार्रवाई जारी है, जबकि स्थानीय स्तर पर प्रशासन और ग्रामीण स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
यह क्रूड ऑयल पर्यावरण के लिए कितना घातक है जानकर आप भी हैरान रह जाओगे।
कच्चा तेल (Crude Oil) कई प्रकार के हानिकारक रासायनिक तत्वों और हाइड्रोकार्बन यौगिकों का मिश्रण होता है। रिसाव के दौरान मुख्य रूप से बेंजीन (Benzene), टोल्यून (Toluene), एथिलबेंजीन (Ethylbenzene), ज़ाइलीन (Xylene) जैसे विषैले रसायन वातावरण और मिट्टी में फैलते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से BTEX केमिकल कहा जाता है। इसके अलावा कच्चे तेल में पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs), सल्फर यौगिक, भारी धातुएं (जैसे निकेल और वैनाडियम) तथा गैसीय तत्व भी पाए जाते हैं। ये रसायन मिट्टी में मिलकर उसकी प्राकृतिक संरचना को खराब कर देते हैं और पौधों की जड़ों तक ऑक्सीजन पहुंचने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जब कच्चा तेल खेतों में फैलता है तो मिट्टी की ऊपरी सतह पर एक तेलीय परत बन जाती है, जिससे पानी का अवशोषण कम हो जाता है। इससे भूमि की उर्वरता घट सकती है और कई वर्षों तक फसल उत्पादन प्रभावित रह सकता है। सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब यह तेल धीरे-धीरे जमीन के अंदर जाकर भूजल स्रोतों को प्रदूषित कर देता है। यदि यह प्रदूषित पानी पशुओं या मनुष्यों द्वारा उपयोग में लिया जाए तो त्वचा रोग, श्वसन समस्याएं, सिरदर्द, आंखों में जलन तथा लंबे समय में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।
मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वनस्पति और सूक्ष्म जीव (Microorganisms) पहले ही सीमित संख्या में होते हैं। तेल रिसाव इन सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर देता है, जो मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा तेल से निकलने वाली गैसें वाष्प बनकर हवा में मिलती हैं, जिससे स्थानीय वायु गुणवत्ता भी प्रभावित होती है और आसपास रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य संबंधी खतरे उत्पन्न हो सकते हैं।
इस प्रकार बाड़मेर की यह घटना केवल एक खेत तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि यह मिट्टी, जल, वायु, पशुधन और मानव स्वास्थ्य — सभी के लिए बहुस्तरीय पर्यावरणीय जोखिम पैदा करने वाली घटना है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावित क्षेत्र की वैज्ञानिक सफाई (Soil Remediation), मिट्टी परीक्षण, भूजल जांच और दीर्घकालीन पर्यावरण निगरानी अत्यंत आवश्यक है, ताकि भविष्य में स्थायी नुकसान को रोका जा सके।